Tuesday, November 30, 2010

आज कि शाम

आज कि शाम अचानक हो उठी है उदास
जाने कहाँ से जगी है कैसी है ये प्यास!
दिल के किस कोने में छुपी थी ये निराशा
जाने क्यूँ महसूस कर रहा हूँ खुद को आज प्यासा.

न दिल में है कुछ अहसास
न ही दिमाग में कोई चक्रवात
मगर लव चाहते हैं कुछ कहना 
ऑंखें चाहती हैं थोडा बरसना

हालाँकि पूछना चाहता हूँ एक सवाल
ढूँढता हूँ दिल में- क्या है ख्याल
खोजने कि कोशिश करता हूँ बार-बार
लेकिन शायद ये कोशिश भी नहीं है ईमानदार

क्यूँ हो रहा है आज ऐसा
कैसे बताऊँ- हल है मेरा कैसा
महसूस कर रहा हूँ किसी कि कमी
आखिर ... आँखों में आ ही गयी नमी....

सामर्थ्य

कभी कभी जिंदगी लगने लगती है है एक भार-
असहनीय,
और आदमी महसूस करता है खुद को-
असहाय,
कहनेवाले कहते रहते हैं-
मनुष्य सामर्थ्यवान है,
कुछ भी कर सकता है-
अपनी मेहनत से, आत्मविश्वास से
और द्ढसंकल्प से- लेकिन
कहीं न कहीं
अपने अंतस में, जानते हैं वो भी
कि एक पल आता है-
जब मनुष्य खुद को सचमुच पता है-
असहाय
प्रतिकूल परिस्थितियां-
दबा देती हैं उत्कट इच्छा को भी
समाज कुचल देता है-
पवित्र भावनाओं को भी
और सामाजिक बंधन -
तोड़कर रख देते हैं
द्ढसंकल्प और आत्मविश्वास को भी,
किसी 'चीज' को पा लेने कि चाह
नागवार गुजरती है अपनों को भी
जबकि हानिकारक नहीं है वो किसी के लिए,
किन्तु एक झूठा दंभ-
बनता है किसी कि 'कामनाओं' के खून का सबब...

Saturday, November 13, 2010

मैं और मेरी मेरी जिंदगी

इन घुमावदार पगडंडियों के एक तरफ -
मैं चल रहा होता हूँ,
और दुसरे छोर पर - खामोश वो चला करती है
मैं उस पर हंसा करता हूँ
वो मुझपे हंसा करती है
मैं जिंदगी से और... जिंदगी मुझसे खेला करती है.

Monday, November 8, 2010

Mere Sapne

इक चारदीवारी है - उजले रंग की,
जहाँ रहता हूँ मैं...
चरों तरफ बिखरे पड़े हैं
मेरे कपड़े बेतरतीब से

और कपड़ों के साथ ही,
बिखड़े पड़े हैं मेरे सपने ...
जिन्हें कभी मैं बहुत हु संभल के रखता था,
मगर अब... 

कभी-कभी मैं कपड़ों को
चुनकर सलीके से रख देता हूँ एक तरफ
सपने आशाभरी निगाहों से देखते हैं मुझे
की शायद आज फिर से उन्हें सजाऊंगा
चुन चुन कर पलकों पे बिछाऊंगा

उनकी आँखों में बेबसी देखकर
सिहर उठता हूँ मैं
चाहता हूँ उन्हें फिर से चुन के सजा लूं
मगर अब.....

आज भी कभी-कभी कपड़ों को सजाकर रखता हूँ मैं,
लेकिन सपने... वो अभी भी बिखड़े पड़े हैं.....

Wednesday, October 6, 2010

चाँद की आंख-मिचौली

ऐसा नहीं कि खुले असमान में अब चाँद मुझे अच्छा नहीं लगता,
नहीं भाती तो बस बादलों से आंख-मिचौली उसकी....
बाहर नहीं निकलता मैं रातों को अब,
कि उसकी रौशनी में मिलावट मुझे बर्दाश्त नहीं...

छोटे होने का अहसास

यूँ तो तन्हाई में भी अकेला होता हूँ मैं...
महफ़िल में और भी अकेला होता हूँ मैं...
जब तनहा होता हूँ... मेरे साथ मेरे जज्बात होते हैं...
महफ़िल में चरों तरफ सिर्फ शोर होता है...
जो उभारते हैं मेरे जज्बातों को...
और अहसास दिला जाते हैं मेरे अकेले होने का...
हालाँकि सिर्फ यही रोग नहीं है मुझे...
और भी कई बीमारियाँ हैं...
जैसे किसी ऊँची इमारत या बड़े पेड़ के नीचे...
अहसास होता है मुझे अपने छोटे होने का...
कचोटता है ये सत्य... कि मैं कुछ कर नहीं पाता...
उनके लिए जिनका मुझ पर अधिकार है और मेरी जरुरत भी...
आज भी मैं अपनी जरूरतों को लेकर ही परेशान हूँ...
बढती जा रही हैं जरूरतें दिन-ब-दिन....
और छोटा होता जा रहूँ मैं...
या शायद.... इमारतें बड़ी होती जा रही हैं...

उम्मीद

तुम ने चलना छोड़ दिया क्यूंकि तुम 'वो' पा न सके, हमने चलना जारी रखा-

इस उम्मीद में की फिर 'कुछ' ऐसा दिखेगा, जिसे न पाने का हमें मलाल रहेगा!!


आँखों का दर्द

जुबाँ की गुस्ताखियाँ हर कानों तक पहुंची.... अफ़सोस आँखों का दर्द कोई न पढ़ पाया!!

परछाई

हम ने जिन के भरोसे दरिया में छलांग लगाई,

उन्होंने हाथ न बढाया और हम डूबते चले गए....गहरे और गहरे!!! 

हमारी खुशनसीबी या बदनसीबी,

 उस गहराई में नजर आती है उनकी ही परछाई !!!


भ्रम

उन आँखों में चाहत की इक लकीर तो दिखी थी,

बहुत गहरी नहीं...हलकी सी खिंची थी,

था मेरा भ्रम या था ये हकीकत,

सोचा नहीं कभी ये उस वक़्त... 

है बिलकुल अलग आज की सच्चाई, 

मगर मिटी नहीं है कल की परछाई... 

झेलकर हमने ज़माने की रुसवाई...

वो झीनी हसीं महक है पाई....


जब नींद से जागा

हमने फूल से उसकी खुशबू का साथ माँगा,

बदले में अपनी जिंदगी देने का किया वादा;

फूल तो था कश- म -कश में मगर कांटे को ये रास न आया, 

जब मरीचिका से जागा तो थोडी सी खुशबू और कांटे का निशान पाया!