Monday, January 11, 2016

Nadaani

तैर रहा था वो छोटा सा कागज़ का टुकड़ा
और उसे पकड़ने की चाह में मैं
दौड़ रहा था, कभी इधर तो कभी उधर

हवा किया करती थी अठखेलियां
मुझ से और मेरी ख्वाहिशों से
उधर मेरी उँगलियों को छूता था वो टुकड़ा
इधर मुस्कान छू जाती थी मेरे लबों को
नादान था मैं तब, बच्चा था

आज भी कई तरह के टुकड़े तैरा करते हैं मेरी नजरों के सामने
उनमें से कुछ कागज़ के भी हैं
हवा आज भी अठखेलियाँ करती हैं
टुकड़े आज भी उंगलिओं को स्पर्श कर निकल जाते हैं
और मुस्कान होठों को

कलेजे को ठंडक नहीं मिलती लेकिन
आँखों में चमक नहीं आती
कदम थक जाते हैं लेकिन
पलकें आलस कर जाती हैं

पूछा करता हूँ अक्सर खुद से मैं -
नादान तब था मैं या नादान अब हूँ?