कभी कभी जिंदगी लगने लगती है है एक भार-
असहनीय,
और आदमी महसूस करता है खुद को-
असहाय,
कहनेवाले कहते रहते हैं-
मनुष्य सामर्थ्यवान है,
कुछ भी कर सकता है-
अपनी मेहनत से, आत्मविश्वास से
और द्ढसंकल्प से- लेकिन
कहीं न कहीं
अपने अंतस में, जानते हैं वो भी
कि एक पल आता है-
जब मनुष्य खुद को सचमुच पता है-
असहाय
प्रतिकूल परिस्थितियां-
दबा देती हैं उत्कट इच्छा को भी
समाज कुचल देता है-
पवित्र भावनाओं को भी
और सामाजिक बंधन -
तोड़कर रख देते हैं
द्ढसंकल्प और आत्मविश्वास को भी,
किसी 'चीज' को पा लेने कि चाह
नागवार गुजरती है अपनों को भी
जबकि हानिकारक नहीं है वो किसी के लिए,
किन्तु एक झूठा दंभ-
बनता है किसी कि 'कामनाओं' के खून का सबब...
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