Monday, November 8, 2010

Mere Sapne

इक चारदीवारी है - उजले रंग की,
जहाँ रहता हूँ मैं...
चरों तरफ बिखरे पड़े हैं
मेरे कपड़े बेतरतीब से

और कपड़ों के साथ ही,
बिखड़े पड़े हैं मेरे सपने ...
जिन्हें कभी मैं बहुत हु संभल के रखता था,
मगर अब... 

कभी-कभी मैं कपड़ों को
चुनकर सलीके से रख देता हूँ एक तरफ
सपने आशाभरी निगाहों से देखते हैं मुझे
की शायद आज फिर से उन्हें सजाऊंगा
चुन चुन कर पलकों पे बिछाऊंगा

उनकी आँखों में बेबसी देखकर
सिहर उठता हूँ मैं
चाहता हूँ उन्हें फिर से चुन के सजा लूं
मगर अब.....

आज भी कभी-कभी कपड़ों को सजाकर रखता हूँ मैं,
लेकिन सपने... वो अभी भी बिखड़े पड़े हैं.....

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