Monday, January 11, 2016

Nadaani

तैर रहा था वो छोटा सा कागज़ का टुकड़ा
और उसे पकड़ने की चाह में मैं
दौड़ रहा था, कभी इधर तो कभी उधर

हवा किया करती थी अठखेलियां
मुझ से और मेरी ख्वाहिशों से
उधर मेरी उँगलियों को छूता था वो टुकड़ा
इधर मुस्कान छू जाती थी मेरे लबों को
नादान था मैं तब, बच्चा था

आज भी कई तरह के टुकड़े तैरा करते हैं मेरी नजरों के सामने
उनमें से कुछ कागज़ के भी हैं
हवा आज भी अठखेलियाँ करती हैं
टुकड़े आज भी उंगलिओं को स्पर्श कर निकल जाते हैं
और मुस्कान होठों को

कलेजे को ठंडक नहीं मिलती लेकिन
आँखों में चमक नहीं आती
कदम थक जाते हैं लेकिन
पलकें आलस कर जाती हैं

पूछा करता हूँ अक्सर खुद से मैं -
नादान तब था मैं या नादान अब हूँ?

Saturday, February 4, 2012

कौन सा साल


एक वो हाल था, जब तेरे बिन जीना मुहाल था,
एक ये हाल है, मरने पर भी कई सवाल हैं.

ऑंखें नहीं देख पातीं, दूर तक
क्या नज़रों के सामने कोई अदृश्य जाल है?
अभी कोई चीख तो गूंजी थी कुछ देर पहले,
कदम नही ठिठके मेरे, जैसे बहरे के लिए कोई ताल है.

भंवरे कहाँ है, पंछी चहचहा क्यूँ नहीं रहे?
कहाँ हैं शाखें, पेड़ों पर ना कोई डाल है.
जाने क्या हो गया है इस शहर को,
क्यूँ नहीं किसी के सर पर कोई बाल है?

ऐसा लगता है युगों-युगों से जीता आ रहा हूँ मैं,
पता नहीं कैसे दिन, कौन सा ये साल है?

Tuesday, February 22, 2011

जब तक तुम किसी और की नहीं हो जाती

जब तक तुम किसी और की नहीं हो जाती
तुम खुद की हो...
इस नीले असमान में जब चाहो, जितना चाहो- 
ऊँचा उड़ सकती हो!

जब तक तुम किसी और की नहीं हो जाती
तुम खुद की हो...
तुम मेरी हो सकती हो...
इस खुले असमान में और भी ऊँचा उड़ सकती हो!

Tuesday, November 30, 2010

आज कि शाम

आज कि शाम अचानक हो उठी है उदास
जाने कहाँ से जगी है कैसी है ये प्यास!
दिल के किस कोने में छुपी थी ये निराशा
जाने क्यूँ महसूस कर रहा हूँ खुद को आज प्यासा.

न दिल में है कुछ अहसास
न ही दिमाग में कोई चक्रवात
मगर लव चाहते हैं कुछ कहना 
ऑंखें चाहती हैं थोडा बरसना

हालाँकि पूछना चाहता हूँ एक सवाल
ढूँढता हूँ दिल में- क्या है ख्याल
खोजने कि कोशिश करता हूँ बार-बार
लेकिन शायद ये कोशिश भी नहीं है ईमानदार

क्यूँ हो रहा है आज ऐसा
कैसे बताऊँ- हल है मेरा कैसा
महसूस कर रहा हूँ किसी कि कमी
आखिर ... आँखों में आ ही गयी नमी....

सामर्थ्य

कभी कभी जिंदगी लगने लगती है है एक भार-
असहनीय,
और आदमी महसूस करता है खुद को-
असहाय,
कहनेवाले कहते रहते हैं-
मनुष्य सामर्थ्यवान है,
कुछ भी कर सकता है-
अपनी मेहनत से, आत्मविश्वास से
और द्ढसंकल्प से- लेकिन
कहीं न कहीं
अपने अंतस में, जानते हैं वो भी
कि एक पल आता है-
जब मनुष्य खुद को सचमुच पता है-
असहाय
प्रतिकूल परिस्थितियां-
दबा देती हैं उत्कट इच्छा को भी
समाज कुचल देता है-
पवित्र भावनाओं को भी
और सामाजिक बंधन -
तोड़कर रख देते हैं
द्ढसंकल्प और आत्मविश्वास को भी,
किसी 'चीज' को पा लेने कि चाह
नागवार गुजरती है अपनों को भी
जबकि हानिकारक नहीं है वो किसी के लिए,
किन्तु एक झूठा दंभ-
बनता है किसी कि 'कामनाओं' के खून का सबब...

Saturday, November 13, 2010

मैं और मेरी मेरी जिंदगी

इन घुमावदार पगडंडियों के एक तरफ -
मैं चल रहा होता हूँ,
और दुसरे छोर पर - खामोश वो चला करती है
मैं उस पर हंसा करता हूँ
वो मुझपे हंसा करती है
मैं जिंदगी से और... जिंदगी मुझसे खेला करती है.

Monday, November 8, 2010

Mere Sapne

इक चारदीवारी है - उजले रंग की,
जहाँ रहता हूँ मैं...
चरों तरफ बिखरे पड़े हैं
मेरे कपड़े बेतरतीब से

और कपड़ों के साथ ही,
बिखड़े पड़े हैं मेरे सपने ...
जिन्हें कभी मैं बहुत हु संभल के रखता था,
मगर अब... 

कभी-कभी मैं कपड़ों को
चुनकर सलीके से रख देता हूँ एक तरफ
सपने आशाभरी निगाहों से देखते हैं मुझे
की शायद आज फिर से उन्हें सजाऊंगा
चुन चुन कर पलकों पे बिछाऊंगा

उनकी आँखों में बेबसी देखकर
सिहर उठता हूँ मैं
चाहता हूँ उन्हें फिर से चुन के सजा लूं
मगर अब.....

आज भी कभी-कभी कपड़ों को सजाकर रखता हूँ मैं,
लेकिन सपने... वो अभी भी बिखड़े पड़े हैं.....