एक वो हाल था, जब तेरे बिन जीना मुहाल था,
एक ये हाल है, मरने पर भी कई सवाल हैं.
ऑंखें नहीं देख पातीं, दूर तक
क्या नज़रों के सामने कोई अदृश्य जाल है?
अभी कोई चीख तो गूंजी थी कुछ देर पहले,
कदम नही ठिठके मेरे, जैसे बहरे के लिए कोई ताल है.
भंवरे कहाँ है, पंछी चहचहा क्यूँ नहीं रहे?
कहाँ हैं शाखें, पेड़ों पर ना कोई डाल है.
जाने क्या हो गया है इस शहर को,
क्यूँ नहीं किसी के सर पर कोई बाल है?
ऐसा लगता है युगों-युगों से जीता आ रहा हूँ मैं,
पता नहीं कैसे दिन, कौन सा ये साल है?