Wednesday, October 6, 2010

चाँद की आंख-मिचौली

ऐसा नहीं कि खुले असमान में अब चाँद मुझे अच्छा नहीं लगता,
नहीं भाती तो बस बादलों से आंख-मिचौली उसकी....
बाहर नहीं निकलता मैं रातों को अब,
कि उसकी रौशनी में मिलावट मुझे बर्दाश्त नहीं...

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