Wednesday, October 6, 2010

चाँद की आंख-मिचौली

ऐसा नहीं कि खुले असमान में अब चाँद मुझे अच्छा नहीं लगता,
नहीं भाती तो बस बादलों से आंख-मिचौली उसकी....
बाहर नहीं निकलता मैं रातों को अब,
कि उसकी रौशनी में मिलावट मुझे बर्दाश्त नहीं...

छोटे होने का अहसास

यूँ तो तन्हाई में भी अकेला होता हूँ मैं...
महफ़िल में और भी अकेला होता हूँ मैं...
जब तनहा होता हूँ... मेरे साथ मेरे जज्बात होते हैं...
महफ़िल में चरों तरफ सिर्फ शोर होता है...
जो उभारते हैं मेरे जज्बातों को...
और अहसास दिला जाते हैं मेरे अकेले होने का...
हालाँकि सिर्फ यही रोग नहीं है मुझे...
और भी कई बीमारियाँ हैं...
जैसे किसी ऊँची इमारत या बड़े पेड़ के नीचे...
अहसास होता है मुझे अपने छोटे होने का...
कचोटता है ये सत्य... कि मैं कुछ कर नहीं पाता...
उनके लिए जिनका मुझ पर अधिकार है और मेरी जरुरत भी...
आज भी मैं अपनी जरूरतों को लेकर ही परेशान हूँ...
बढती जा रही हैं जरूरतें दिन-ब-दिन....
और छोटा होता जा रहूँ मैं...
या शायद.... इमारतें बड़ी होती जा रही हैं...

उम्मीद

तुम ने चलना छोड़ दिया क्यूंकि तुम 'वो' पा न सके, हमने चलना जारी रखा-

इस उम्मीद में की फिर 'कुछ' ऐसा दिखेगा, जिसे न पाने का हमें मलाल रहेगा!!


आँखों का दर्द

जुबाँ की गुस्ताखियाँ हर कानों तक पहुंची.... अफ़सोस आँखों का दर्द कोई न पढ़ पाया!!

परछाई

हम ने जिन के भरोसे दरिया में छलांग लगाई,

उन्होंने हाथ न बढाया और हम डूबते चले गए....गहरे और गहरे!!! 

हमारी खुशनसीबी या बदनसीबी,

 उस गहराई में नजर आती है उनकी ही परछाई !!!


भ्रम

उन आँखों में चाहत की इक लकीर तो दिखी थी,

बहुत गहरी नहीं...हलकी सी खिंची थी,

था मेरा भ्रम या था ये हकीकत,

सोचा नहीं कभी ये उस वक़्त... 

है बिलकुल अलग आज की सच्चाई, 

मगर मिटी नहीं है कल की परछाई... 

झेलकर हमने ज़माने की रुसवाई...

वो झीनी हसीं महक है पाई....


जब नींद से जागा

हमने फूल से उसकी खुशबू का साथ माँगा,

बदले में अपनी जिंदगी देने का किया वादा;

फूल तो था कश- म -कश में मगर कांटे को ये रास न आया, 

जब मरीचिका से जागा तो थोडी सी खुशबू और कांटे का निशान पाया!