तैर रहा था वो छोटा सा कागज़ का टुकड़ा
और उसे पकड़ने की चाह में मैं
दौड़ रहा था, कभी इधर तो कभी उधर
हवा किया करती थी अठखेलियां
मुझ से और मेरी ख्वाहिशों से
उधर मेरी उँगलियों को छूता था वो टुकड़ा
इधर मुस्कान छू जाती थी मेरे लबों को
नादान था मैं तब, बच्चा था
आज भी कई तरह के टुकड़े तैरा करते हैं मेरी नजरों के सामने
उनमें से कुछ कागज़ के भी हैं
हवा आज भी अठखेलियाँ करती हैं
टुकड़े आज भी उंगलिओं को स्पर्श कर निकल जाते हैं
और मुस्कान होठों को
कलेजे को ठंडक नहीं मिलती लेकिन
आँखों में चमक नहीं आती
कदम थक जाते हैं लेकिन
पलकें आलस कर जाती हैं
पूछा करता हूँ अक्सर खुद से मैं -
नादान तब था मैं या नादान अब हूँ?
और उसे पकड़ने की चाह में मैं
दौड़ रहा था, कभी इधर तो कभी उधर
हवा किया करती थी अठखेलियां
मुझ से और मेरी ख्वाहिशों से
उधर मेरी उँगलियों को छूता था वो टुकड़ा
इधर मुस्कान छू जाती थी मेरे लबों को
नादान था मैं तब, बच्चा था
आज भी कई तरह के टुकड़े तैरा करते हैं मेरी नजरों के सामने
उनमें से कुछ कागज़ के भी हैं
हवा आज भी अठखेलियाँ करती हैं
टुकड़े आज भी उंगलिओं को स्पर्श कर निकल जाते हैं
और मुस्कान होठों को
कलेजे को ठंडक नहीं मिलती लेकिन
आँखों में चमक नहीं आती
कदम थक जाते हैं लेकिन
पलकें आलस कर जाती हैं
पूछा करता हूँ अक्सर खुद से मैं -
नादान तब था मैं या नादान अब हूँ?
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